अध्याय13 श्लोक14 - श्रीमद भगवद गीता

श्रीमद भगवद गीता

अध्याय 13 : पुरुष और प्रकृति

अ 13 : श 14

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥

संधि विच्छेद

सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतः अक्षि सिरः मुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ॥

अनुवाद

सब ओर हैं उसके हाँथ और पांव, उसके सिर और मुख | सभी तरफ हैं उसके कान | सभी लोकों को आवृत(आक्षादित) करते हुए वह स्थित है |

व्याख्या

इसके पहले के श्लोक में ब्रह्म के पहले तीन गुणों का वर्णन किया गया, वह पहले तीन गुण हैं

१. अनादि
२. श्री कृष्ण से उत्त्पन्न और
३. न जीवित न अजीवित

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्णा ब्रह्म के चौथे गुण का वर्णन कर रहे हैं| ब्रह्म सर्वव्यापी है | ब्रह्म की सर्वव्यापकता का वर्णन करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने भौतिक उपमाओं का उल्लेख है.
उन उपमाओं का वर्णन इस प्रकार है

१. सब और हैं उसके हाँथ और पाँव

हाँथ और पाँव मनुष्य की कर्म इन्द्रियां हैं | इस उपमा के उल्लेख करने का तात्पर्य यह यह बताना है की ब्रह्म वह शक्ति है जो ब्रम्हांड में कर्मो को प्रभावित करता है |यहाँ पर यह प्रश्न उठता की आखिर ब्रह्म ब्रम्हांड में होने वाले कर्मो को प्रभावित कैसे करता है और अगर करता है तो उसके प्रमाण क्या हैं ? इसका सीधा उत्तर श्रीमद भगवद गीता के शायद इस श्लोक से देना संभव हो

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

[वास्तव में] सारे कार्य प्रकृति के नियम और गुणों के [परिवर्तन के ] द्वारा किए जाते हैं, लेकिन अहंकार और अज्ञानतावश मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ', ऐसा मानता है॥

प्रकृति के सारे नियम, प्रकृति के तीनो गुण जिनके परिवर्तन से सारे कार्य संपन्न होते हैं वे ब्रह्म के कार्मिक शक्ति के ही द्योतक हैं|

२. सब ओर हैं उसके हाँथ और पांव, उसके सिर और मुख | सभी तरफ हैं उसके कान |

ब्रह्म के सिर, मुख और कान भी ब्रम्हांड में सभी और हैं ब्रह्म के लिए उपमा है| इसका कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रम्हांड में होने वाले प्रत्येक क्रिया कलाप का ब्रम्ह को विदित है| इसकी व्याख्या सनातन धर्म में स्थित दूसरे सिद्धांत से की जा सकती है , उस सिद्धांत का नाम है प्रारब्ध | मनुष्य जो कुछ भी अच्छा या बुरा करता है उससे उसका प्रारब्ध बनता है जो एक जन्म से दूसरे जन्मो में उस मनुष्य का भाग्य निर्धारित करता है| यह तभी संभव है जब ऐसी कोई शक्ति हो जिसका विस्तार सभी जगह हो और जो सबकुछ देख या सुन सकता है| ब्रम्हांड में कोई और दूसरी शक्ति नहीं ब्रह्म के सिवाय जिसमे ऐसी शक्ति हो |

३. सभी लोकों को आवृत(आक्षादित) करता है |

यह ब्रह्म के सर्वव्यापी होना का विवरण है| ब्रह्म ब्रम्हांड के सभी लोकों को चारो ओर से वैसे ही आक्षादित करता है (ढकता है ) जैसे आकाश ब्रम्हांड को आक्षादित करता है |

सारांश यह है कि ब्रह्म एक अध्भुत शक्ति है जो सर्वयापी है, जिसमे अपार बुद्धि है और और जिसमे अपार क्षमता है |

ब्रह्म भगवान श्री कृष्ण की आतंरिक शक्ति है, इसी शक्ति से प्रकृति के सारे नियम संचालित होते है, इस शक्ति से मनुष्यों के प्रारब्ध निर्मित और सुरक्षित रहते हैं| पुरे ब्रम्हांड में फैला ब्रह्म जीवन का आधार है|
इस सिद्धांत में आगे कई दूसरे सिधनत जुड़ते चले जाते हैं जिसमे मोक्ष और पुनर्जन्म से जुडी बाते आ जाती है | इसमें यह भी जुड़ता है की किस तरह मनुष्य की आत्मा ही जीवन और शरीर का स्वामि होता और कैसे पूजा या साधना के फल निर्धारित या प्रभावित होते हैं| ब्रह्म अतः एक विस्तृत विषय है|